Nature’s Pause
Entering Menopause Gracefully Embracing Ayurveda
Nature’s Pause: Entering Menopause Gracefully Embracing Ayurveda is a compassionate and practical guide for women navigating the transformative journey of perimenopause and menopause. Written by Vaidya Sameer Mukund Paranjpe, an experienced Ayurveda physician with over 16 years of clinical practice, this book combines timeless Ayurvedic wisdom with modern understanding to help women embrace this natural phase of life with confidence and grace.
Menopause is not a disease—it is a significant transition that brings physical, emotional, and hormonal changes. Many women experience hot flashes, sleep disturbances, mood swings, anxiety, weight gain, fatigue, digestive issues, joint pain, and a decline in overall well-being. Through this book, readers gain valuable insights into the Ayurvedic perspective of menopause and learn how to restore balance naturally.
The book offers practical guidance on diet, lifestyle, daily routines, herbal support, stress management, yoga, meditation, and holistic self-care strategies. Rather than merely managing symptoms, it encourages women to understand their bodies and cultivate long-term health, vitality, and emotional resilience.
Drawing from years of clinical experience treating women from India and around the world, Vaidya Sameer presents menopause as an opportunity for growth, self-discovery, and renewed wellness. This Amazon bestselling book serves as a trusted companion for women seeking a natural, holistic, and empowering approach to midlife health through Ayurveda.
‘ती’ ला जपतांना
स्त्री आरोग्याचा समग्र आयुर्वेदिक दृष्टिकोन
“ती ला जपतांना” हे डॉ. समीर मुकुंद परांजपे यांनी लिहिलेले स्त्री आरोग्याविषयीचे पुस्तक आहे. स्त्रीच्या आयुष्यातील विविध टप्पे, विशेषतः चाळिशीनंतरचे बदल, पेरीमेनोपॉज (Perimenopause) आणि मेनोपॉज (Menopause) या काळातील शारीरिक आणि मानसिक आव्हाने समजून घेण्यासाठी हे पुस्तक लिहिले आहे.
स्त्री आयुष्यभर कुटुंबाची, मुलांची आणि इतरांची काळजी घेत असते; मात्र अनेकदा स्वतःच्या आरोग्याकडे दुर्लक्ष करते. थकवा, झोपेच्या समस्या, चिडचिड, वजन वाढणे, गरम झटके, सांधेदुखी, गुडघेदुखी, पाठदुखी, मासिक पाळीतील बदल किंवा मानसिक अस्वस्थता यांसारख्या लक्षणांकडे “वयाचा परिणाम” म्हणून दुर्लक्ष केले जाते.
“ती ला जपतांना” या पुस्तकाचा उद्देश भीती निर्माण करणे नसून स्त्रियांमध्ये स्त्री आरोग्याविषयी जागरूकता निर्माण करणे हा आहे.
पेरीमेनोपॉज आणि मेनोपॉज समजून घेणे
पेरीमेनोपॉज हा मेनोपॉजपूर्व संक्रमणाचा काळ आहे. या काळात प्रत्येक स्त्रीचा अनुभव वेगळा असू शकतो. मासिक पाळीच्या चक्रातील बदल, गरम झटके, झोपेच्या समस्या, थकवा, मूडमध्ये बदल, वजनातील बदल, सांधेदुखी आणि इतर तक्रारी जाणवू शकतात.
या लक्षणांकडे दुर्लक्ष करण्याऐवजी आपल्या शरीरातील बदल समजून घेणे आणि आवश्यकतेनुसार योग्य वैद्यकीय सल्ला घेणे महत्त्वाचे आहे.
स्त्री आरोग्यासाठी आयुर्वेदिक दृष्टिकोन
आयुर्वेद शरीर, मन, आहार, दिनचर्या, झोप आणि जीवनशैली यांचा परस्पर संबंध लक्षात घेऊन आरोग्याकडे पाहतो. त्यामुळे महिलांचे आरोग्य केवळ एका लक्षणापुरते मर्यादित न ठेवता संपूर्ण व्यक्तीचा विचार करून समजून घेणे आवश्यक आहे.
योग्य आहार, नियमित हालचाल, स्नायूंचे आरोग्य, पुरेशी झोप, ताणाचे व्यवस्थापन आणि वैयक्तिक गरजेनुसार आयुर्वेदिक मार्गदर्शन यांचा स्त्रीच्या आरोग्यप्रवासात महत्त्वाचा वाटा असू शकतो.
परिणिता वुमन वेलनेस सेंटर
परिणिता वुमन वेलनेस सेंटर, खेरडी, दापोली, रत्नागिरी, महाराष्ट्र येथे डॉ. समीर मुकुंद परांजपे यांच्या मार्गदर्शनाखाली स्त्रियांच्या आरोग्याकडे समग्र दृष्टिकोनातून पाहण्याचा प्रयत्न केला जातो.
“ती ला जपतांना” हे पुस्तक म्हणजे प्रत्येक स्त्रीने स्वतःच्या शरीराकडे, मनाकडे आणि आरोग्याकडे अधिक सजगतेने पाहावे, यासाठी सुरू केलेला एक आरोग्यसंवाद आहे.
प्रत्येक स्त्रीसाठी एक संदेश
तुम्ही आयुष्यभर इतरांची काळजी घेतली. आता स्वतःच्या आरोग्याचीही काळजी घ्या.
“ती ला जपतांना” — स्वतःला समजून घेण्यासाठी, बदल स्वीकारण्यासाठी आणि आरोग्यपूर्ण आयुष्याकडे आत्मविश्वासाने वाटचाल करण्यासाठी.
मैं बदल रही हूँ और ये ठीक है
महिलाओं के स्वास्थ्य को समझने की एक नई शुरुआत
“मैं बदल रही हूँ और ये ठीक है” डॉ. समीर मुकुंद परांजपे द्वारा लिखी गई एक हिंदी पुस्तक है, जो विशेष रूप से 40 वर्ष की उम्र के बाद महिलाओं के शरीर और मन में होने वाले बदलावों, पेरीमेनोपॉज़ (Perimenopause) और मेनोपॉज़ (Menopause) को समझने में मदद करने के उद्देश्य से लिखी गई है।
महिला अपने जीवन में अनेक भूमिकाएँ निभाती है। वह बेटी, पत्नी, माँ, बहन, प्रोफेशनल और परिवार की जिम्मेदार सदस्य होती है। वह जीवनभर दूसरों की देखभाल करती है, लेकिन कई बार अपने स्वास्थ्य को सबसे पीछे रख देती है।
चालीस वर्ष की उम्र के बाद शरीर में होने वाले बदलावों के साथ कई महिलाओं को मासिक धर्म में अनियमितता, हॉट फ्लैशेज, नींद की समस्या, थकान, चिड़चिड़ापन, मूड में बदलाव, वजन बढ़ना, घुटनों और जोड़ों में दर्द, कमर दर्द, चिंता और मानसिक असहजता जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
अक्सर इन लक्षणों को केवल “उम्र बढ़ने का असर” मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। लेकिन शरीर में हो रहे बदलावों को समझना और सही समय पर उचित स्वास्थ्य सलाह लेना महत्वपूर्ण है।
पेरीमेनोपॉज़ और मेनोपॉज़ को समझना
पेरीमेनोपॉज़ मेनोपॉज़ से पहले का एक संक्रमणकाल है। इस दौरान हर महिला का अनुभव अलग हो सकता है। किसी महिला को बहुत कम लक्षण महसूस हो सकते हैं, जबकि दूसरी महिला को कई शारीरिक और मानसिक बदलावों का सामना करना पड़ सकता है।
“मैं बदल रही हूँ और ये ठीक है” का उद्देश्य महिलाओं में डर पैदा करना नहीं, बल्कि उन्हें अपने शरीर के संकेतों को समझने और अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होने के लिए प्रेरित करना है।
महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
आयुर्वेद स्वास्थ्य को केवल किसी एक बीमारी या लक्षण तक सीमित नहीं रखता। आहार, दिनचर्या, नींद, शारीरिक गतिविधि, मानसिक स्वास्थ्य और जीवनशैली—इन सभी का समग्र विचार आवश्यक है।
40 के बाद महिला के शरीर की आवश्यकताएँ बदल सकती हैं। इसलिए इस अवस्था में संतुलित आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद, तनाव प्रबंधन और व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुसार उचित स्वास्थ्य मार्गदर्शन महत्वपूर्ण हो सकता है।
परिणिता वुमन वेलनेस सेंटर
परिणिता वुमन वेलनेस सेंटर, खेरडी, दापोली, रत्नागिरी, महाराष्ट्र में डॉ. समीर मुकुंद परांजपे महिलाओं के स्वास्थ्य को समग्र दृष्टिकोण से समझने और आयुर्वेद के माध्यम से मार्गदर्शन देने की दिशा में कार्य करते हैं।
“मैं बदल रही हूँ और ये ठीक है” केवल एक पुस्तक का नाम नहीं, बल्कि हर महिला के लिए एक सकारात्मक संदेश है—
“मेरे शरीर में बदलाव हो रहे हैं, और मुझे उन्हें समझने, स्वीकार करने और अपने स्वास्थ्य की देखभाल करने का अधिकार है।”
अगर आप 40 वर्ष की उम्र के बाद अपने शरीर में हो रहे बदलावों को बेहतर ढंग से समझना चाहती हैं, तो यह पुस्तक आपके लिए एक उपयोगी स्वास्थ्य-संवाद की शुरुआत हो सकती है।

